प्राकृत भाषा के विकास को समर्पित केन्द्र बन सकता है जैन विश्वभारती संस्थान- आचार्य महाश्रमण
लाडनूँ, 9 अप्रेल 2026। संस्थान के प्राकृत एवं संस्कृत विभाग के तत्वाववधान में ’प्राकृत रचना-धर्मिता के मानक मापदण्ड तथा शोध की भावी योजनाएं’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय प्राकृत विद्वत् कार्यशाला 9-10 अप्रेल का उद्घाटन सत्र अकादमिक खंड स्थित संगोष्ठी कक्ष में अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण जी के सान्निध्य में हुआ। कार्यक्रम में आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा कि प्राकृत भाषा के साथ संस्कृत व हिन्दी एक परिवार के रूप में है। भारत सरकार ने प्राकृत भाषा को शास्त्रीय भाषा के रूप में मान्यता प्रदान की है। इस दृष्टि से विद्वज्जनों को इस भाषा के उत्थान व विकास के लिए चिंतन व प्रयास करना चाहिए। सरकार की अनुकूल मनोदशा का लाभ भी उचित दिशा में मिल सकता है और जैन विश्वभारती संस्थान प्राकृत भाषा के विकास को समर्पित केन्द्र बन सकता है। उन्होंने कहा कि प्राकृत भाषा के विकास की दृष्टि से प्राकृत भाषा का कथा कोश व दृष्टांत कोश का निर्माण भी जरूरी है। आचार्यश्री ने जैन विश्वभारती द्वारा प्राकृत भाषा के क्षेत्र में किए गये आगमिक कार्यों पर चर्चा करते हुए कहा कि अभी प्राकृत के क्षेत्र में और अधिक काम होने संभावना है।
कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने समारोह की अध्यक्षता करते हुए अपने सम्बोधन में भारत सरकार द्वारा प्राकृत को शास्त्रीय भाषा की मान्यता प्रदान करने पर आभार व्यक्त किया विश्वास व्यक्त कियह संस्थान प्राकृत भाषा का प्रमुख केन्द्र बने। कुलपति़ ने कहा कि जरूरत है कि देश भर के प्राकृत संस्थान व विद्वज्जन समन्वित होकर कार्य करें तो हम भी अधिक सक्षमता से कार्य कर सकेगें। मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रपति सम्मानित विद्वान् प्रो. प्रेम सुमन जैन ने कहा कि प्राकृत भाषा के उत्थान एवं विकास की दृष्टि से कुछ संस्थाएं विद्वान तैयार कर रही है। प्राकृत भाषा के क्षेत्र में कार्य कर रही संस्था ’भारतीय प्राकृत स्काॅलर सोसायटी’ का केन्द्र भी यहां होना चाहिए।
मुख्य वक्ता जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. धर्मचन्द्र जैन ने प्राकृत भाषा की प्रासंगिकता, उसकी सांस्कृतिक धरोहर और शोध की संभावनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। विशिष्ट अतिथि के रूप में एल.डी. इंस्टिट्यूट ऑफ इंडोलॉजी, अहमदाबाद के पूर्व निदेशक प्रो. जितेन्द्र बी. शाह ने भी अपने विचार रखे। इससे पूर्व स्वागत एवं विषय प्रवर्तन प्राकृत एवं संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. जिनेन्द्र कुमार जैन ने किया। उन्होंने सभी संभागियों का स्वागत करते हुए कार्यशाला के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। मुमुक्षु रूचिता व प्रियंका ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। इस अवसर पर मुख्य मुनिश्री महावीर कुमार जी, संस्थान के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनिश्री कुमार श्रमण जी, जैन विष्वभारती के अध्यक्ष अमरचन्द लूंकड, मंत्री सलिल लोढा सहित अनेक मुनिगण, विद्वज्जन, षिक्षक व शोधार्थी उपस्थित रहे। संयोजन डॉ. सत्यनारायण भारद्वाज ने किया।
समापन सत्र में आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा, प्राकृत भाषा में जीवतंता बढे और इसके उन्नयन के लिए उचित प्रयास हों
दो दिवसीय राष्ट्रीय प्राकृत विद्वत् कार्यशाला का समापन जैन विश्व भारती स्थित महाश्रमण विहार में अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी के सान्निध्य में हुआ। इस सत्र में देशभर से आए विद्वानों, शिक्षाविदों एवं गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति रही। इस अवसर पर श्रद्धेय अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी ने कहा कि प्राकृत भाषा को आगे बढाने के लिए एवं भाषा के विकास एवं उत्थान के लिए विद्वज्जनों का समवाय होना चाहिए। भाषा के संदर्भ में जीवतंता और बढे, इसके उन्नयन के लिए भी उचित प्रयास भी होने चाहिए। आचार्यश्री ने विद्वानों की साहित्यिक कृतियों का अवलोकन करते हुए कहा कि प्राकृत में रचनाधर्मिता का विकास भी आवश्यक है। साहित्य रचना से भाषा गरिमापूर्ण होती है। अधिक से अधिक प्राकृत भाषा में साहित्य रचना बढे। अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने कहा कि दो दिवसीय कार्यशाला में प्राकृत भाषा के सभी विद्वतज्जन एकत्रित होकर कार्य करेगें। इसके साथ ही एक राष्ट्रीय मंच भी बनाने पर चर्चा हुई है। इसके अलावा संस्थान के प्रोजेक्ट कार्य के साथ स्वतंत्र रूप से पुस्तक संपादन पर भी सहमति बनी है। इसी प्रकार संस्थान में प्राकृत एवं जैन विद्या के विद्वान तैयार करने के लिए भी हरसंभव प्रयास किये जायेगे। इस अवसर पर प्रो. प्रेमसुमन जैन, प्रो. धर्मचन्द्र जैन, प्रो, जगतराम भट्टाचार्य, प्रो. हरिशंकर पाण्डेय, प्रो. विजयकुमार जैन, प्रो. सुषमा सिंघवी, प्रो. कल्पना जैन, प्रो दामोदर शास्त्री आदि ने बौद्धिक परंपराओं और प्राकृत भाषा के विविधमुखी साहित्यिक योगदान की चर्चा करते हुए अपने विचार साझा किए। इस दो दिवसीय कार्यशाला के प्रतिवेदन की प्रस्तुति प्रो. जिनेन्द्र कुमार जैन द्वारा की गई। इससे पूर्व कार्यशाला में समागत सभी विद्वानों ने कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड के साथ मुलाकात कर प्राकृत भाषा के उत्थान एवं विकास के साथ विभिन्न शैक्षणिक विषयों पर चर्चा की। कुलपति प्रो दूगड़ ने प्राकृत भाषा के विकास के लिए हरसंभव सहयोग का विश्वास दिलाया।
कार्यशाला के द्वितीय एवं तृतीय अकादमिक सत्रों में प्राकृत भाषा के रचना-लेखन, अध्ययन-अध्यापन के मानकों तथा भावी शोध योजनाओं पर विद्वानों ने गहन विचार-विमर्श किया। द्वितीय अकादमिक सत्र की अध्यक्षता प्रो. ऋषभ चंद्र जैन ‘फौजदार’ ने की। तृतीय अकादमिक सत्र में ’शोध समीक्षा एवं भावी योजनाओं पर चर्चा’ की गई। जिसमें ’प्राकृत शोध समीक्षा एवं भावी शोध योजनाओं हेतु शासकीय अनुदान’ विषय पर विस्तार से चर्चा की गई। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. जितेन्द्र बी. शाह (पूर्व निदेशक, एल.डी. इंस्टिट्यूट ऑफ इंडोलॉजी, अहमदाबाद) ने की।
चैथे एवं पांचवें सत्र में प्राकृत पांडुलिपियों, शोध प्रस्तावों और अकादमिक विषयों पर गहन चर्चा हुई। इन सत्रों में देशभर से आए विद्वानों और शोधार्थियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई। चैथा सत्र प्राकृत पांडुलिपियों पर केंद्रित अकादमिक चर्चा सत्र आयोजित हुआ। इस सत्र का विषय ’प्राकृत पांडुलिपि-सांस्कृतिक संपादन, प्रकाशन एवं सूचीकरण’ रहा। सत्र की अध्यक्षता प्रो. प्रेम सुमन जैन (उदयपुर) ने की। पांचवें सत्र में ’प्रस्तावित प्राकृत शोध प्रस्तावों का आवंटन एवं स्वीकृति’ विषय पर चर्चा हुई। अध्यक्षता प्रो. सुषमा सिंघवी (जयपुर) ने की।



