समस्त बुराइयों का मूल मिथ्या दृष्टिकोण होता है- डाॅ. वीरबाला छाजेड़
कभी एक वाक्य में पूर्ण सत्य नहीं कहा जा सकता
डाॅ. वीरबाला ने कहा कि सम्यक दर्शन को व्यवहार नय और निश्चय की दृष्टि से समझने की जरूरत है। पूर्ण सत्य को एक वाक्य में नहीं बताया जा सकता है। सत्यांश ही कहा जा सकता है। हर वस्तु को उसके वास्तविक रूप में जानना ही सम्यक् दर्शन कहा जा सकता हैं। उन्होंने बताया कि व्यवहार नय से सम्यक् दर्शन के स्वरूप में देव, गुरू व धर्म के प्रति हमारी आस्था होनी चाहिए। जीव, अजीव, पुण्य, पाप आदि नव तत्वों को जानना जरूरी है और धर्मास्तिकाय, अधमास्तिकाय, आकाशस्तिकाय, पुदगलास्तिकाय आदि षट् द्रव्यों को जानना आवश्यक है। तत्वज्ञान की तरफ हमारा रूझान कम होता है। सम्यक् दर्शन की पहचान के लक्षण हैं- शम, संवेग, निर्वेग, अनुकम्पा व आस्तिक्य। जिसका कषाय शांत होता है, वह सम्यक् दृष्टि होती है। निर्वेग में संसार से विरक्ति होती है और अनुकम्पा में दया व करूणा के भाव पशु-पक्षी, पेड़-पौधे आदि सबके प्रति होती है।
सम्यक् दर्शन के भूषण व मिथ्यात्वों का वर्णन
डाॅ. छाजेड़ ने बताया कि आस्था की आवश्यकता भी जरूरी है। जैन दर्शन पूरा आत्मा पर टिका हुआ है। आत्मा पर आस्था नहीं रही तो जैन दर्शन ही नहीं रहता है। सम्यक् दर्शन के भूषण में उन्होंने स्थैर्य, भक्ति, प्रभावना, कौशल और तीर्थसेवा को बताया। मन को विचलित नहीं होने देना और धर्म में स्थिर कर देना होता है। सम्यक् दर्शन के दोषों में शंका, कांक्षा, विचिकित्सा यानि संशय व आत्महीनता, पर पाखंड संस्तव और पर पाखंड परिचय शामिल हैं। उन्होंने मिथ्यात्व के 10 प्रकार बताए और कहा कि जीव को अजीव समझना, अजीव को जीव समझना, धर्म को अधर्म समझना, साधु को असाधु समझना, असाधु को साधु समझना, मार्ग को कुमार्ग समझना, कुमार्ग को मार्ग समझना, बद्ध को मुक्त समझना तथा मुक्त को बद्ध समझना हैं। यह सब मिथ्यादृष्टि है। सम्यक्दृष्टि रखने से ही हमारी आत्मा ही परमात्मा बन सकती है। स्वयं चैतन्यमान हो सकते हैं। इसलिए अपने आप में कभी हीन भावना नहीं रखनी चाहिए। सब लोग अपना सम्यक् दृष्टि जीवन बनाएं। कर्ता भाव नहीं रखें। ज्ञाता-दृष्टा भाव आत्मा का मानें। शरीर की जरूरतें हैं संयोग के साथ होती है, जो भी करें कर्तव्यभाव से करें।
ज्ञान को जीवन में उतारा जाए
व्याख्यान के अंत में डा. वीरबाला छाजेड़ ने व्याख्यान के सहभागियों की जिज्ञासाओें का समाधान किया गया। अध्यक्षता करते हुए प्रो. त्रिपाठी ने ज्ञान को जीवन में उतारे जाने की जरूरत बताई और कहा कि आचार्यों ने सम्यक् दर्शन में आत्मा को मानने की आवश्यकता बताई और कहा कि आत्मा को बिना माने दर्शन सम्यक् नहीं हो सकते। कार्यक्रम का प्रारम्भ ईर्या जैन शास्त्री ने मंगलाचरण करके किया। प्रमुख वक्ता डा. वीरबाला छाजेड़ का परिचय व स्वागत वक्तव्य प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ने प्रस्तुत किया। अंत में धन्यवाद ज्ञापन डा. रामदेव साहू ने किया। इस अवसर पर चन्दन जैन, हरेन्द्र गैणा, तरूण जैन, सुमन, ललिता जैन, डा. राजेश, सीताराम भादू, रामदेव, सुनीता, नवीन, प्रणीता तलेसरा, विमल, सुरेन्द्र, स्मिता जैन, मनीषा चैहान, स्मृति अरोड़ा, विमल गुणेचा, विद्या घोड़ावत, सुनीता इंदौरिया, नेहा वी शाह, सपना जैन आदि सहभागी रहे। कार्यक्रम में संचालन डाॅ. मनीषा जैन ने किया।



